भारत में Crypto और DeFi को लेकर Tax Tracking एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। आयकर विभाग ने हाल ही में सांसदों को बताया कि इन डिजिटल सिस्टम्स के कारण ट्रांजैक्शन को ट्रैक करना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। अधिकारियों के अनुसार, गुमनाम वॉलेट और तेज़ क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसफर टैक्स व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं।
डिपार्टमेंट का मानना है कि ट्रेडिशनल बैंकिंग सिस्टम की तुलना में यह नया Tax Tracking का यह स्ट्रक्चर ज्यादा कठिन है, क्योंकि इसमें कोई सेंट्रलाइज़्ड कंट्रोल नहीं होता। इसी वजह से सही समय पर सही जानकारी जुटाना आसान नहीं रह गया है।
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इनकम टैक्स ऑफिसर्स ने बताया कि बड़ी संख्या में यूज़र ऐसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जहां पहचान स्पष्ट नहीं होती। खासतौर पर DeFi सिस्टम में कोई सेंट्रल संस्था मौजूद नहीं होती, जिससे डेटा कलेक्ट चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
इसके अलावा, विदेशी एक्सचेंज भारत के कानूनी दायरे से बाहर काम करते हैं, जिससे सहयोग की कमी महसूस होती है। यह स्थिति टैक्स चोरी के शक को और बढ़ा देती है।
भारत सरकार ने साल 2022 में डिजिटल एसेट्स के लिए टैक्स नियम लागू किए थे। इसका उद्देश्य बढ़ते मार्केट से रेवेन्यू सुनिश्चित करना था, लेकिन कई दिक्कतें सामने आ रही हैं।
मौजूदा टैक्स प्रोविजन
मौजूदा नियमों के अनुसार, क्रिप्टो से होने वाली कमाई पर सरकार सीधे 30 प्रतिशत टैक्स वसूलती है।
इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति 50,000 रुपये से ज्यादा का ट्रांसफर करता है, तो उस पर 1 प्रतिशत TDS काटा जाता है।
इन नियमों में यह भी साफ है कि अगर किसी को क्रिप्टो में नुकसान होता है, तो उसे दूसरे प्रॉफिट से घटाने की परमिशन नहीं है।
अधिकारियों का कहना है कि Tax Tracking कानून कड़े होने के बावजूद ट्रांजैक्शन पर सही तरीके से नजर न रख पाने के कारण सरकार को उम्मीद के मुताबिक Tax नहीं मिल पा रहा है।
हाल ही में भारत में Crypto Regulation और Tax पर सुधार की मांग की गई है। क्रिप्टो सेक्टर से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि बजट 2026-27 में क्रिप्टो से जुड़े नियमों और टैक्स स्ट्रक्चर को ज्यादा व्यावहारिक बनाया गया, तो भारत ग्लोबल लेवल पर क्रिप्टो इंडस्ट्री में मजबूत पहचान बना सकता है।
यूनियन बजट आने से पहले Tax Tracking का यह मामला सरकार के लिए काफी अहम बन गया है। माना जा रहा है कि अगर क्रिप्टो ट्रांजैक्शन को ट्रैक करने की व्यवस्था बेहतर नहीं हुई, तो हर साल सरकार को बड़े टैक्स अमाउंट का नुकसान हो सकता है। इसी वजह से Income Tax Department अब नई टेक्नोलॉजी पर ज्यादा ध्यान देने की तैयारी कर रहा है।
भविष्य में डेटा एनालिटिक्स जैसे टूल्स का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है, जिससे ट्रांजैक्शन को आसानी से समझा जा सके। इसके साथ ही, दूसरे देशों के साथ सहयोग और जानकारी शेयर करने पर भी काम किया जाएगा, ताकि विदेशी प्लेटफॉर्म्स से जुड़े ट्रांजैक्शन की जानकारी मिल सके।
सोशल मीडिया पर Tax Tracking के इस बयान को लेकर अलग-अलग राय सामने आई हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि पहचान छुपी रहने से पैसों पर ज्यादा आज़ादी मिलती है।
कई यूज़र सरकार के कड़े नियमों और निगरानी से नाराज़ नजर आए।
कुछ लोगों ने कहा कि सख्त कानून या रोक लगाना ही सही सॉल्यूशन है।
जानकारों का कहना है कि पूरी तरह से रोक लगाना सही हल नहीं है। उनका मानना है कि सरकार को ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिनसे नई टेक्नोलॉजी आगे बढ़ती रहे और लोग टैक्स भी सही तरीके से भरें।
पिछले 7 सालों में मैंने देखा है कि सरकार और क्रिप्टो इंडस्ट्री के बीच तालमेल की कमी रही है। सिर्फ सख्त नियम बनाना काफी नहीं होता, मजबूत Tax Tracking सिस्टम भी जरूरी है। बैलेंस्ड रेगुलेशन ही इस सेक्टर को सुरक्षित और ट्रांसपेरेंट बना सकता है।
भारत में Crypto और DeFi तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन Tax Tracking की कमजोर व्यवस्था सरकार के लिए बड़ी चिंता बन गई है। गुमनाम वॉलेट, विदेशी एक्सचेंज और तेज़ ट्रांजैक्शन टैक्स सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि पूरी तरह से प्रतिबंध समाधान नहीं है। बेहतर टेक्नोलॉजी, इंटरनेशनल सहयोग और स्पष्ट नियमों के जरिए ही सरकार रेवेन्यू भी सुरक्षित कर सकती है और इनोवेशन को भी नुकसान से बचा सकती है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और समाचार उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी को निवेश या कानूनी सलाह न माना जाए। क्रिप्टो से जुड़े किसी भी फैसले से पहले योग्य फाइनेंशियल या टैक्स एडवाइजर से सलाह जरूर करें।
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