दुनियाभर में डिजिटल करेंसी को लेकर सरकारों की निगरानी लगातार तेज़ होती जा रही है। भारत सरकार ने पहले से ही Crypto Tax चोरी करने वालों पर शिकंजा कस दिया है और अब यूनाइटेड किंगडम ने Crypto Tax चोरी पर पूरी तरह लगाम कसने का ऐलान कर दिया है। इस कदम के तहत वॉलेट ट्रैकिंग, जानकारी शेयर करने के नियम और सख़्त कंप्लायंस व्यवस्था लागू की जा रही है। जानकारों के मुताबिक, यह बदलाव साफ संकेत देता है कि डिजिटल एसेट अब किसी भी देश की टैक्स सिस्टम से बाहर नहीं रहेंगे।
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UK की नई क्रिप्टो टैक्स पॉलिसी क्या है?
यूके सरकार जनवरी 2026 से Crypto Asset Reporting Framework (CARF) लागू करने जा रही है। इसका मकसद क्रिप्टो ट्रांजैक्शन को पूरी तरह Tax सिस्टम के दायरे में लाना है।
इस फ्रेमवर्क के मुख्य बिंदु:
क्रिप्टो एक्सचेंजों को यूज़र्स की जानकारी Tax डिपार्टमेंट को देनी होगी।
वॉलेट ट्रांजैक्शन पर कड़ी निगरानी।
Tax से जुड़ी जानकारी छुपाने पर सख़्त कार्रवाई।
Tax चोरी रोककर एक्स्ट्रा रेवेन्यू जुटाने की योजना।
सरकारी अनुमान के मुताबिक, इस व्यवस्था से करीब 40 मिलियन पाउंड की एक्स्ट्रा Tax इनकम हो सकती है।
भारत पहले ही उठा चुका है कड़ा कदम
अगर भारत की बात करें, तो यहां सरकार पहले ही 2022 में डिजिटल एसेट्स पर कड़ा रुख अपना चुकी है। प्रॉफिट पर 30 प्रतिशत टैक्स और हर ट्रांजैक्शन पर 1 प्रतिशत TDS लागू किया गया। इस फैसले के बाद शुरुआती दौर में मार्केट पर गहरा असर पड़ा। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रेडिंग एक्टिविटी में भारी गिरावट देखने को मिली और कुछ प्लेटफॉर्म पर वॉल्यूम 90 प्रतिशत से भी अधिक कम हो गया।
समय के साथ बढ़ा कंप्लायंस
हालांकि, समय के साथ स्थिति में बदलाव आया। स्पष्ट नियमों और कानूनी स्ट्रक्चर के चलते धीरे-धीरे कंप्लायंस बढ़ा। निवेशकों ने यह समझना शुरू किया कि नियमों के भीतर रहकर काम करना ही लंबे समय में सुरक्षित ऑप्शन है। टैक्स भुगतान के मामले में भी जागरूकता बढ़ी, जिससे सरकार को रेवेन्यू मिलने लगा।
लेकिन क्या सख़्ती सबके लिए फायदेमंद है?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सख़्त Tax व्यवस्था के दो पहलू होते हैं। एक ओर इससे ट्रांसपेरेंसी आती है और गैरकानूनी एक्टिविटीज पर रोक लगती है। दूसरी ओर, अधिक बोझ के कारण कुछ यूजर्स विदेशी या अनियमित प्लेटफॉर्म की ओर रुख कर सकते हैं। एक EY रिपोर्ट (2023) के अनुसार, अधिक टैक्स वाले क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत क्रिप्टो यूजर्स ने ऐसे प्लेटफॉर्म चुने, जहां नियम अपेक्षाकृत कमजोर थे।
सभी देशों का लक्ष्य एक, रास्ते अलग
यही वजह है कि सरकारों के सामने बैलेंस बनाना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। बहुत ज़्यादा सख्ती इनोवेशन को नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि ढील देने से टैक्स चोरी और अवैध गतिविधियों का खतरा बढ़ जाता है। यूके और भारत दोनों के उदाहरण यह दिखाते हैं कि लक्ष्य एक ही है डिजिटल एसेट्स को औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाना।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले समय में और देश भी इसी दिशा में कदम उठा सकते हैं। इंटरनेशनल सहयोग, डेटा शेयर करने की व्यवस्था और टेक्निकल निगरानी से क्रिप्टो सेक्टर पर कण्ट्रोल बढ़ेगा। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह मार्केट अब पूरी तरह “रेडार से बाहर” नहीं रह सकता।
पिछले 7 वर्षों में मैंने क्रिप्टो मार्केट को बिना नियमों से सख़्त रेगुलेशन तक जाते देखा है। अनुभव बताता है कि डर से ज़्यादा स्पष्ट नियम निवेशकों को टिकाए रखते हैं। संतुलित Crypto Tax पॉलिसी ही लॉन्ग टर्म ग्रोथ की असली नींव बनती है।
कन्क्लूजन
अब यह स्पष्ट है कि क्रिप्टो सेक्टर पर सरकारों की नज़र बनी रहेगी। टैक्स से बचने का रास्ता अब आसान नहीं रहा। असली सवाल यह नहीं है कि टैक्स लगेगा या नहीं, बल्कि यह है कि नियम कितने संतुलित होंगे। अगर कानून बहुत ज़्यादा सख़्त हुए, तो कुछ लोग देश के बाहर या अनियमित प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं। वहीं, समझदारी से बनाए गए नियम लोगों को नियमों का पालन करने के लिए इंस्पायर करते हैं। ऐसी पॉलिसी से निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और मार्केट ज़्यादा सुरक्षित बनता है। इसलिए बैलेंस ही क्रिप्टो सेक्टर के भविष्य की सबसे बड़ी चाबी है।
डिस्क्लेमर: यह न्यूज़ आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और एजुकेशनल पर्पस के लिए है। इसे निवेश, टैक्स या कानूनी सलाह न माना जाए। क्रिप्टो निवेश में जोखिम होता है इसलिए किसी भी फाइनेंशियल डिसीजन से पहले अपने टैक्स एडवाइजर या फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स से सलाह अवश्य लें।
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