Gujarat High Court ने 2018 के चर्चित क्रिप्टो एक्सटॉर्शन केस में पूर्व IPS अधिकारी Jagdish Patel को बड़ी राहत देते हुए उनकी उम्रकैद की सजा पर फिलहाल रोक लगाकर शर्तों के साथ जमानत दे दी है। यह मामला Surat के व्यापारी Shailesh Bhatt के किडनेप और कथित रूप से क्रिप्टोकरेंसी की जबरन वसूली से जुड़ा है।
इस Crypto Extortion Case में August 2025 में विशेष ACB (Anti-Corruption Bureau) कोर्ट ने कुल 15 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इनमें पूर्व विधायक Nalin Kotadiya भी शामिल थे। आरोप था कि भट्ट का अपहरण कर उनसे क्रिप्टोकरेंसी वसूलने की साजिश रची गई थी। हालांकि, हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पटेल की अपील पर सुनवाई करते हुए पाया कि उनके खिलाफ आरोप मुख्य रूप से Circumstantial Evidence पर आधारित हैं।
Crypto Extortion के इस मामले में Gujarat High Court ने सुनवाई के दौरान पाया कि Jagdish Patel के खिलाफ लगाए गए आरोप ठोस और प्रत्यक्ष सबूतों पर आधारित नहीं हैं, उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि पटेल किडनेप की घटना के समय मौके पर मौजूद थे। साथ ही, जांच के दौरान यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया कि उनका अन्य आरोपियों के साथ सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संपर्क था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि, इस कथित Crypto Extortion से उन्हें किसी प्रकार का आर्थिक लाभ मिलने का कोई पुख्ता सबूत रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। इन सभी तथ्यों और अपील की सुनवाई में संभावित देरी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने न्यायिक संतुलन बनाए रखते हुए उन्हें अंतिम निर्णय आने तक शर्तों के साथ जमानत देने का फैसला किया।
जानकारी के अनुसार, शैलेश भट्ट का कथित रूप से कुछ पुलिसकर्मियों ने अपहरण किया था। आरोप है कि भट्ट ने पहले एक अन्य व्यापारी Dhaval Mavani से बिटकॉइन हासिल किए थे, जिसके बाद यह पूरा मामला क्रिप्टो वसूली की साजिश में बदल गया।
कन्क्लूजन
Gujarat High Court का यह फैसला दिखाता है कि किसी भी आपराधिक मामले में केवल आरोप नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय सबूत सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। Jagdish Patel को मिली जमानत यह संकेत देती है कि न्यायालय हर पहलू की गहराई से जांच करता है और संदेह का लाभ आरोपी को दिया जा सकता है। यह मामला भारत में Crypto Extortion से जुड़े मामलों और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता को भी उजागर करता है।
डिस्क्लेमर
यह आर्टिकल उपलब्ध कानूनी दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। मामला अभी अदालत में लंबित है और अंतिम निर्णय आना बाकी है। इसे कानूनी सलाह न माना जाए।
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