SEBI Demat 2.0 का पायलट प्रोजेक्ट क्या है? निवेशको के लिए इसके फायदे ?
Demat 2.0 क्या है?
Demat 2.0 सिक्योरिटीज मार्केट के लिए तैयार की गई एक नई डिजिटल व्यवस्था है। इसका उद्देश्य कॉरपोरेट बॉन्ड को जारी करने से लेकर उनके रिकॉर्ड रखने, ट्रेडिंग और सेटलमेंट तक की प्रक्रिया को अधिक तेज और कुशल बनाना है।
इस व्यवस्था में कॉरपोरेट बॉन्ड को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (DLT) पर एक डिजिटल टोकन के रूप में रिकॉर्ड किया जाता है। बॉन्ड से जुड़ी जानकारी इस डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर में दर्ज रहती है और अधिकृत मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं के लिए उपलब्ध होती है। इस व्यवस्था में डिपॉजिटरीज़ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
टोकनाइज्ड बॉन्ड क्या होते हैं?
टोकनाइज्ड बॉन्ड कोई नई क्रिप्टोकरेंसी नहीं है। इसमें किसी मौजूदा रेग्यूलेटेड कॉरपोरेट बॉन्ड को डिजिटल टोकन के रूप में रिकॉर्ड किया जाता है, जबकि बॉन्ड की मूल शर्तें, जैसे ब्याज, मैच्योरिटी और जारीकर्ता की भुगतान जिम्मेदारी, बनी रहती हैं।
उदाहरण के लिए, REC ने ₹500 करोड़ का टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड जारी किया, जिसमें 7.30% कूपन था। इस बॉन्ड की ओनरशिप को DLT आधारित सिस्टम में रिकॉर्ड किया गया। यानी टोकन यहां किसी अलग क्रिप्टो एसेट को नहीं, बल्कि वास्तविक बॉन्ड की डिजिटल ओनरशिप को दर्शाता है।
Demat 2.0 में CBDC और Atomic Settlement का क्या रोल है?
Demat 2.0 की खासियत सिर्फ बॉन्ड को टोकनाइज करना नहीं है। इसमें सिक्योरिटी के डिजिटल रिकॉर्ड को RBI की होलसेल CBDC यानी e-रूपी से जोड़कर Atomic Settlement का लक्ष्य रखा गया है।
आसान भाषा में इसका मतलब है कि बॉन्ड का ट्रांसफर और भुगतान एक साथ सेटल हो। यानी खरीदार को बॉन्ड तभी मिले, जब भुगतान हो और भुगतान तभी पूरा हो, जब बॉन्ड ट्रांसफर हो जाए। इससे सेटलमेंट रिस्क और अलग-अलग सिस्टम के रिकॉर्ड को बार-बार मिलाने की जरूरत कम हो सकती है।
दुनिया में टोकनाइज्ड बॉन्ड की क्या स्थिति है?
भारत अकेला देश नहीं है जो इस दिशा में काम कर रहा है। Hong Kong, Switzerland और Europe जैसे वित्तीय केंद्रों में भी टोकनाइज्ड सिक्योरिटीज और DLT आधारित बॉन्ड सेटलमेंट पर प्रयोग किए जा रहे हैं।
भारत की खासियत यह है कि यहां टोकनाइज्ड सिक्योरिटी, DLT, सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी और मौजूदा रेग्यूलेटेड मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। यानी फोकस केवल बॉन्ड को डिजिटल टोकन में बदलने पर नहीं, बल्कि सिक्योरिटी और भुगतान को एक ही डिजिटल फ्लो में लाने पर है।
भारत किस बात में सबसे अलग है?
भारत का Demat 2.0 मॉडल इसलिए खास है क्योंकि यहां कॉरपोरेट बॉन्ड को DLT के जरिए डिजिटल रूप में रिकॉर्ड किया जा रहा है, जबकि उनका रिकॉर्ड देश के कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त डिपॉजिटरीज़ के पास रहता है। इसके साथ ही, बॉन्ड के भुगतान के लिए मौजूदा रेग्यूलेटेड मार्केट व्यवस्था के तहत सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किया जाता है।
इस मॉडल में DLT आधारित सिक्योरिटी रिकॉर्ड + डिपॉजिटरी सिस्टम + CBDC आधारित भुगतान को एक ही व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यही Demat 2.0 को केवल बॉन्ड टोकनाइजेशन के प्रयोग से आगे ले जाकर एक नए सेटलमेंट मॉडल के रूप में महत्वपूर्ण बनाता है।
अभी Demat 2.0 में कौन निवेश कर सकता है?
फिलहाल यह सामान्य रिटेल निवेशकों के लिए खुला निवेश प्रोडक्ट नहीं है। शुरुआती पायलट संस्थागत निवेशकों पर केंद्रित है। इसमें REC, L&T और IIFL से जुड़े करीब ₹1,025 करोड़ के टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड शामिल हैं।
इसलिए अभी किसी सामान्य क्रिप्टो एक्सचेंज या अनजान वेबसाइट से “Demat 2.0 बॉन्ड” खरीदने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर कोई प्लेटफॉर्म गारंटीड रिटर्न का दावा करता है, तो उसकी जानकारी को SEBI और RBI के आधिकारिक स्रोतों से वेरिफ़ाई करना जरूरी है।
Demat 2.0 से निवेशकों को क्या फायदा हो सकता है?
अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है, तो तेज सेटलमेंट, बेहतर डिजिटल रिकॉर्ड, कम रीकन्सिलिएशन और ब्याज या रिडेम्प्शन जैसे कामों के ऑटोमेशन की संभावना बढ़ सकती है।
स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट आधारित सिस्टम से कुछ एसेट-सर्विसिंग गतिविधियां तय नियमों के अनुसार अपने आप एक्सिक्यूट हो सकती हैं। इससे भविष्य में बॉन्ड के कूपन भुगतान और अन्य प्रक्रियाओं को संभालना आसान हो सकता है।
हालांकि, टोकनाइजेशन से बॉन्ड का क्रेडिट रिस्क, ब्याज दर का रिस्क या लिक्विडिटी रिस्क खत्म नहीं होता। किसी कंपनी के डिफॉल्ट करने का जोखिम बॉन्ड के टोकनाइज्ड होने के बाद भी बना रहता है। इसी तरह शुरुआती टोकनाइज्ड बॉन्ड के सेकेंडरी मार्केट में लिक्विडिटी भी अभी पूरी तरह टेस्ट नहीं हुई है।
Final Remark
Demat 2.0 को नया Demat Account या क्रिप्टोकरेंसी प्रोडक्ट समझना सही नहीं होगा। यह भारत के सिक्योरिटीज मार्केट में टोकनाइजेशन, DLT, CBDC और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट को जोड़कर बॉन्ड के रिकॉर्ड, सेटलमेंट और एसेट-सर्विसिंग को बेहतर बनाने का पायलट है।
अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में कॉरपोरेट बॉन्ड के साथ दूसरे फाइनेंशियल एसेट्स के सेटलमेंट और डिजिटल रिकॉर्ड का तरीका भी बदल सकता है। हालांकि, अभी इसे रिटेल निवेशकों के लिए उपलब्ध नया निवेश विकल्प मानना जल्दबाजी होगी।