India में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर लागू टैक्स ढांचा अब भी सख्त बना हुआ है। 30% फ्लैट टैक्स Section 115BBH और 1% TDS जैसे प्रावधानों के बीच सबसे ज्यादा भ्रम “लॉस सेट-ऑफ” को लेकर देखा जाता है। कई निवेशक मानते हैं कि Crypto Market एक एसेट में हुए नुकसान को दूसरे के मुनाफे से एडजस्ट किया जा सकता है, जबकि मौजूदा नियम इसके बिल्कुल विपरीत हैं।
इस रिपोर्ट में हम आम मिथकों और उनकी रियलिटी को समझते हैं, साथ ही यह भी जानेंगे कि इन नियमों का Crypto Market पर क्या असर पड़ रहा है।
VDA ट्रांसफर से होने वाले नुकसान को किसी दूसरे Crypto एसेट के मुनाफे से एडजस्ट नहीं किया जा सकता, सैलरी, बिजनेस या अन्य आय से सेट-ऑफ और अगले साल के लिए कैरी फॉरवर्ड नहीं किया जा सकता। इसका मतलब है कि हर प्रॉफिटेबल ट्रांजैक्शन पर टैक्स देना होगा, चाहे कुल पोर्टफोलियो लॉस में ही क्यों न हो।
1. मिथ: नुकसान को दूसरे कॉइन के मुनाफे से एडजस्ट कर सकते हैं
रियलिटी: कानून इसकी अनुमति नहीं देता। हर लाभ पर अलग टैक्स लगता है।
2. मिथ: साल भर का नेट लॉस हो तो टैक्स न देना पड़ेगा
रियलिटी: यदि कुछ ट्रेड्स में लाभ हुआ है, तो उन पर टैक्स देना अनिवार्य है।
3. मिथ: नुकसान को सैलरी या बिजनेस इनकम से सेट-ऑफ कर सकते हैं।
रियलिटी: VDA लॉस किसी अन्य आय कैटेगरी से एडजस्ट नहीं होता।
4. मिथ: नुकसान को अगले साल के लिए कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं।
रियलिटी: इस तरह की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
5. मिथ: बिजनेस इनकम दिखाने पर राहत मिल सकती है।
रियलिटी: VDA नियम लागू रहेंगे, चाहे एक्टिविटी को बिजनेस माना जाए या नहीं।
6. मिथ: Gas Fee और अन्य खर्च डिडक्ट किए जा सकते हैं।
रियलिटी: केवल Cost of Acquisition ही मान्य है।
7. मिथ: शेयर बाजार जैसे नियम लागू होते हैं।
रियलिटी: Crypto एसेट्स के लिए अलग और अधिक सख्त नियम हैं।
8. मिथ: रिवॉर्ड्स में नुकसान होने पर टैक्स बच सकता है।
रियलिटी: प्राप्ति के समय वैल्यू पर टैक्स लगता है, बाद का नुकसान एडजस्ट नहीं होता।
9. मिथ: होल्ड करने पर रिपोर्टिंग की जरूरत नहीं।
रियलिटी: लाभ होने पर रिपोर्टिंग अनिवार्य है।
10. 2026 में नियम बदल जाएंगे।
रियलिटी: अभी तक कोई बदलाव नहीं हुआ है।
ट्रांजैक्शन ट्रैकिंग को मजबूत करना।
टैक्स चोरी को रोकना।
रिपोर्टिंग सिस्टम को ट्रांसपैरंट बनाना।
लेकिन, कुछ लचीलापन देने से कंप्लायंस बढ़ सकता है और घरेलू ट्रेडिंग को बढ़ावा मिल सकता है।
सतर्कता में वृद्धि: निवेशक अब अधिक डेटा-ड्रिवन निर्णय ले रहे हैं।
ट्रांसपेरेंसी: रिपोर्टिंग बेहतर हुई है।
शॉर्ट-टर्म दबाव: ट्रेडिंग वॉल्यूम में गिरावट देखी जा सकती है।
लॉन्ग-टर्म स्टेब्लिटी: रेगुलेटेड माहौल से विश्वास बढ़ सकता है।
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Digital एसेट्स में निवेश करते समय “लॉस ऑफसेट” की उम्मीद करना वर्तमान नियमों के अनुसार सही योजना नहीं है। प्लानिंग करते समय केवल लाभ वाले ट्रांजैक्शन्स पर ध्यान देना और सही रिपोर्टिंग करना जरूरी है। सख्त ढांचे में अनुशासन ही जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
Disclaimer
यह लेख केवल शैक्षणिक और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे टैक्स, निवेश या कानूनी सलाह के रूप में न लें। नियम समय-समय पर बदल सकते हैं, इसलिए किसी भी निर्णय से पहले आधिकारिक स्रोत या योग्य सलाहकार से परामर्श करना आवश्यक है।
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